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Wednesday, 9 May 2018

इश्क


मेरी गलियोंसे जब भी गुजरो
रफ़्तार जरा तुम धीमे रखना ...
क्या पता, ठहरा हुआ वो लम्हा
तुम्हे फिरसे मेरी ओर ले चले .....

Friday, 16 June 2017

आजही का तू किनाऱ्याशी?

आजही का तू किनाऱ्याशी?

सांजवेळी आज पुन्हा सावली होऊन तू
का अताशा छेडते? ते धुंद सुमधुर गीत तू .....

रंगली सूरेल आहे गीतसंध्या अजुनही
चंद्र तारे आसमंती, तूच तू का अंतरी? .....

भास का वेळी अवेळी? सांगना आहेस तू
प्रेम माझे तूच पहिले, श्वास माझा तू जणू ......

साचलेल्या वेदनांना मी सखे रोखू कसे?
आजही का तू किनाऱ्याशी? तळ जरा गाठ तू ......

साद माझी ऐकना, मंदावल्या जर तारका
ज्योत तू हो ना, विसर अंधार, हो तू काजवा ......


                        मिलिंद कुंभारे  

Tuesday, 27 September 2016

कलम से लिखना छोड़ दिया है हमने


कलम से लिखना छोड़ दिया है हमने
जबसे निगाहों को मेरी पढ़ लिया है तुमने ....

कागज पे लिखना छोड़ दिया है हमने
जबसे धडकनों को मेरी थाम लिया है तुमने 


मिलिंद कुंभारे 



Wednesday, 9 September 2015

सफ़र


(यह कविता समर्पित है अरुणा शानबाग को जो ४२ वर्षों तक कोमा में रही और जीवन और मरण के बीच संघर्ष करती रहीं।)

सफ़र

अँखियों में उसकी
ठहरा हुआ-सा समंदर था
बस कुछ सिसकियाँ
और टुटा हुआ एक ख़्वाब था …………

अनकहा-सा कोई दर्द था
अनसुना-सा कोई राग था
बस बेवजह
वह दिल का धड़कना था …………

न कोई सुबह,
न शाम का पता था
सफर जीवन का
मानो थम सा गया था ................

मृत्यु शैय्या पे
बरसों बिखरा जीर्ण शरीर था
न कोई दवा,
न कोई मरहम था …………

एक प्रश्न-सा मन में उठा है 
जीवन और मरण के बीच
क्यूँ था उम्रभर का फासला ?

एक प्रश्न-सा मन में उठा है
क्या यही जीवन की अनबूझ पहेली है ?
क्या यही जीवन है ?

मिलिंद कुंभारे

Wednesday, 17 June 2015

आस वेडी जगण्याची

ही कविता ४२वर्षे मृत्त्युशी झुंजणाऱ्या अरुणा nurse ला समर्पित......

आस वेडी जगण्याची

थिजलेल्या डोळ्यांत तिच्या
गोठलेला पाऊस होता
अधांतरिच आयुष्याच्या
श्वास जणू थांबला होता........

आसवे जरी आटली
नजर मात्र होती बोलकी
ती झुंज होती मृत्युशी
कि आस वेडी जगण्याची..........

स्वप्ने सारी राहिली अधूरी
कोरडाच सारा जन्म जाहला
मेघ नाही कधीच बरसला
नाही कळले कधी संपला प्रवास तिचा...........

अनुत्तरित  एक प्रश्न मनाला
जगण्यावर करावे मी प्रेम कितीदा?
का अव्यक्त असाव्या व्यथा वेदना ?
तेव्हा का नसावा मृतत्युचा मार्ग मोकळा ?

मिलिंद कुंभारे

Wednesday, 3 September 2014

ज्ञान का सागर!

ज्ञान का सागर!


किनारे किनारे चले थे हम,
अनजानी सी थी राहें,
अनकहिंसी थी मंजिले!

वो आपही है जिन्होंने;
सागर की गहराईओं से
ज्ञात कराया;
सही दिशाओंसे
परिचित कराया;
और एक विशाल दृष्टी का
एहसास दिलाया!


जबसे मिलन  के क्षण 
विलिन होते जा रहे है 
राहें और भी लंबी हो रही है 
भले ही मंजिलें और भी है 
पर मजधार में हम है फसें 
इक हुक सी उठी है ह्रदय में 
आपसे दूर होने की !

काश!
समय को अपने मन की डोरी से 
बाँध लेते हम 
कुछ क्षण, कुछ पल 
और जी लेते हम...
ज्ञान के सागर में 
थोड़ा और डूब लेते हम ....
कुछ क्षण और जी लेते हम....

मिलिंद कुंभारे